सम्पूर्ण बगडावत कथा 3

गुर्जर आराध्य श्री देवनारायण भगवान गुर्जर जाति पर आधारित

       सम्पूर्ण बगडावत कथा 3



          अपनी 12 औरतों से बाघ जी की 24 संतान होती हैं वह बगड़ावत कहलाते हैं बगड़ावत गुर्जर जाति से संबंध रखते थे इनका मुख्य व्यवसाय पशुपालन था और बड़े पैमाने पर इनका पशुपालन का कारोबार था वह इस कार्य में प्रवीण थे और उन्होंने अपनी गायों की नस्ल सुधारी थी उनके पास बहुत बढ़िया नस्ल की गाये थी गाथा के अनुसार काबरा नामक सांड उत्तम जातिका सांड था उनके पास चार बढ़िया नस्ल की गाय थी जिनमें सूरह, कामधेनु, पार्वती, और नागल गायें थी। इनकी हिफाजत और सेवा में यह लोग लगे रहते थे बगड़ावत भाइयों में सबसे बड़े तेजाजी, सवाई भोज, नियाजी, बहारावत आदि थे।  सवाई भोज की शादी मालवा में साडू माता के साथ होती हैं। साडू माता के यहां से भी दहेज में बगड़ावतों को पशुधन मिलता है एक ग्वला जिसका नाम नापा ग्वाल होता है उसे 

बगड़ावत साडू माता के पीहर मालवा से लाते हैं नापा ग्वल इनके पशुओं को जंगल में चराने का काम करता था ।इसके अधीन भी कई ग्वाले होते हैं जो गायों की देखरेख करते थे। गाथा के अनुसार बगड़ावतों के पास 180000 गायें और 1444 ग्वले थे एक बार बगड़ावत गाये चराकर लौट रहे होते हैं तब उन गायों में एक गाय ऐसी होती हैं जो रोज उनकी गायों के साथ शामिल हो जाती थी और शाम को लौटते समय वह गाय अलग चली जाती है। सवाई भोज यह देखते हैं कि यह गाय रोज अपनी गायों के साथ आती हैं और चली जाती हैं यह देख सवाई भोज अपने भाई नियाजी को कहते हैं कि इस गाय के पीछे जाओ और पता करो कि यह गाय किसकी है और कहां से आती हैं। इसके मालिक से अपनी ग्वाली का मेहनताना लेकर आना नियाजी उस गाय के पीछे पीछे जाते हैं वह गाय एक गुफा में जाती हैं वहां नियाजी भी पहुंच जाते हैं और देखते हैं कि गुफा में एक साधु (बाबा रूपनाथ जी) धोनी के पास बैठे साधना कर रहे हैं। नियाजी साधु से पूछते हैं कि महाराज यह गाए आप की हैं साधु कहते हैं। हां गाय तो हमारी ही है नियाजी कहते हैं आपको इस गुवाली देनी होगी यह रोज हमारी गायों के साथ चरने आती हैं हम इसकी देखरेख करते हैं साधु कहता है। अपने झोली मांडो नियाजी, अपने कंबल की झोली फैलाते हैं। बाबा रूपनाथ जी धूनी में से धोबे भर धूणी की राख नियाजी की झोली में डाल देते हैं नियाजी राख लेकर वहां से अपने घर की ओर चल देते हैं। रास्ते में साधु के द्वारा दी गई धोनी की राख को गिरा देते हैं और घर आकर राख वाले कंबल को खूंटी पर टांग देते हैं। जब रात होती हैं तो अंधेरे में खूंटी पर टंगे कंबल से प्रकाश फूटता है। तब सवाईभोज देखते हैं कि उस कंबल में कहीं-कहीं सोने और हीरे  जवाहरात लगे हुए हैं तो वह नियाजी से सारी बात पूछते हैं। नियाजी सारी बात बताते हैं बगड़ावतों को लगता है कि जरूर वह साधु कोई करामाती पहुंचा हुआ है यह जानकर कि वह राख मायावी थी सवाईभोज अगले दिन उस साधु की गुफा में जाते हैं और रूपनाथ जी को प्रणाम करके बैठ जाते हैं
, और बाबा रूपनाथ जी की सेवा करते हैं यह क्रम कई दिनों तक चलता रहता है एक दिन बाबा रूपनाथ जी निर्वत होने के लिए गुफा से बाहर कहीं जाते हैं पीछे से सवाईभोज गुफा के सभी हि
स्सों में घूम फिर कर देखते हैं उन्हें एक जगह इंसानों के कटे सिर दिखाई देते हैं वह सवाई भोज को देख कर हंसते हैं सवाई भोज उन कटे हुए सिरो से पूछते हैं कि हंस क्यों रहे हो तब उन्हें जवाब मिलता है कि तुम थोड़े दिनों में हमारी जमात में शामिल होने वाले हो यानि तुम्हारा हाल भी हमारे जैसा ही होने वाला है हम भी बाबा की ऐसे ही सेवा करते थे थोड़े दिनों में ही बाबा ने हमारे सिर काटकर गुफा में डाल दिए ऐसा ही हाल तुम्हारा भी होने वाला हैं। यह सुनकर सवाईभोज सावधान हो जाते हैं थोड़ी देर बाद बाबा रूपनाथ जी वापस लौट आते हैं और सवाईभोज से कहते हैं कि मैं तेरी सेवा से प्रसन्न हुआ आज मैं तेरे को एक विद्या सिखाता हूं सवाईभोज से एक बड़ा कडाव और तेल लेकर आने के लिए कहते हैं सवाईभोज बाबा रूपनाथ जी के कहे अनुसार एक बड़ा कड़ाव और तेल लेकर पहुंचते हैं बाबा कहते हैं कि अलाव (आग) जलाकर कड़ा उस पर चढ़ा दें और तेल कड़वा में डाल दे तेल पूरी तरह से गर्म हो जाने पर रूपनाथ जी सवाईभोज से कहते हैं कि आजा इस कड़ाव की परिक्रमा करते हैं आगे सवाई भोज और पीछे बाबा रूपनाथ जी कड़ाव की परिक्रमा शुरू करते हैं बाबा रूपनाथ जी सवाई भोज के पीछे पीछे चलते हुए एक कदम सवाई भोज को कड़ा में धकेलने का प्रयत्न करते हैं सवाई भोज पहले से ही सावधान होते हैं। इसलिए छलांग लगाकर कडा़व के दूसरी और कूद जाते हैं और बच जाते हैं फिर सवाईभोज बाबा रूपनाथ से कहते हैं महाराज अब आप आगे आ जाओ और फिर से परिक्रमा शुरू करते हैं सवाईभोज जवानों ताकतवर होते हैं इस बार वह परिक्रमा करते समय आगे चल रहे बाबा रूपनाथ को उठाकर गर्म तेल के कडा़व में डाल देते हैं और रूपनाथ का शरीर कडा़व में गिरते ही सोने का हो जाता है। वह सोने का पोरसा बन जाता है तभी अचानक आकाश से आकाशवाणी होती है कि सवाईभोज तुम्हारी
12 बरस की काया  है और 12 बरस की माया है यानी 12 साल की ही बगड़ावतों की  आयू हैं और बाबा रूपनाथ जी की गुफा से मिले धन की माया की 12 साल तुम्हारे साथ रहेगी और एक आकाशवाणी यह भी होती है कि यह सोने का पोरसा है इसको तुम पांव की तरफ से काटोगे तो यह बढ़ेगा और यदि सिर की तरफ सेे काटोगे तो घटता जाएगा इस धन को तुम लोग खूब खर्च करना दान पुण्य करना सवाई भोज को बाबा रूपनाथ की गुफा से भी काफी सारा धन मिलता है जिनमें एक जयमंगला हाती, एक सोने का खांडा,बुवली घोडी, सुुरह गाय,  सोने का पोरसा, कश्मीरी तंबू इत्यादि दुर्लभ चीजें लेकर सवाई भोज घर आ जातेे हैं

प्रस्तुतकर्ता  हरदेव गुर्जर बागा खेड़ा


दोस्तों मैं यह कथा लिख रहा हूं बगड़ावत 24 भाइयों की इसमें कोई भूल चूक हुई हो तो मुझे बालक समझकर माफ कर देना और ऐसी नई नई कहानियां आप तक पहुंचती रहे उसके लिए साइड में एक घंटी का निशान है उस निशान पर ओके करिए और इस वेबसाइट को सब्सक्राइब कर लीजिए ताकि हम जितने अपडेट करेंगे वह नोटिफिकेशन आप तक पहुंचती रहेगी ओके और भी आपका कोई सवाल हो तो आप नीचे हमारे कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं और इसे शेयर जरूर करना दोस्तों
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